
जयपुर की रहने वाली रेणु सिंघी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि संकल्प के आगे उम्र की कोई सीमा नहीं होती। 59 वर्ष की आयु में उन्होंने जयपुर से कोलकाता तक 1570 किलोमीटर का लंबा सफर केवल 7 दिनों में साइकिल चलाकर पूरा किया। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया है, और खेल जगत में उनकी ‘आयरन लेडी’ की छवि को और भी मजबूत बना दिया है।
इस साहसिक यात्रा के दौरान रेणु को मौसम की कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भीषण सर्दी और रास्ते में पड़ने वाले घने कोहरे के बावजूद उनका आत्मविश्वास कम नहीं हुआ। वे जयपुर से रवाना होकर फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, अयोध्या और वाराणसी जैसे प्रमुख शहरों से गुजरते हुए कोलकाता पहुंचीं। इस सफर के दौरान वाराणसी तक जोधपुर के साइकिलिस्ट प्रद्युम्न सिंह ने भी उनका साथ दिया, जिससे उनकी यह यात्रा बेहद यादगार बन गई।
रेणु सिंघी की उपलब्धियों का दायरा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक बड़ा नाम बन चुकी हैं। हाल ही में उन्होंने मलेशिया और सिंगापुर में आयोजित साइकिलिंग इवेंट्स में 600 किलोमीटर की दूरी तय की थी। इन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली वे एकमात्र महिला साइकिलिस्ट रहीं, जो उनकी खेल के प्रति अटूट निष्ठा को दर्शाता है।
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रेणु सिंघी की साहसिक कहानियों में दुर्गम रास्तों पर विजय पाना शामिल है। उन्होंने श्रीनगर से खारदुंग-ला होते हुए करीब 620 किलोमीटर तक साइकिलिंग की है, जो दुनिया के सबसे ऊंचे रास्तों में से एक माना जाता है। इसके अलावा, उन्होंने दिल्ली से मुंबई तक की 1500 किलोमीटर की दूरी को महज 5 दिनों में पूरा कर अपनी रफ्तार और सहनशक्ति का परिचय दिया था, जिससे वे साइकिलिंग जगत में एक मिसाल बन गईं।
रेणु सिंघी के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड दर्ज है जो देश की किसी और महिला साइकिलिस्ट के पास नहीं है। वे अब तक 19 अलग-अलग देशों में साइकिल चला चुकी हैं। उन्होंने यूरोप की प्रसिद्ध ‘नॉर्थकेप-4000’ अल्ट्रा साइकिलिंग प्रतियोगिता में भी जीत हासिल की है। इस दौरान उन्होंने इटली, जर्मनी, स्वीडन और नॉर्वे जैसे कई देशों की सीमाओं को अपनी साइकिल से पार किया, जो उनकी वैश्विक पहचान का प्रमुख कारण है।
उनकी खेल उपलब्धियों में रिकॉर्ड्स की एक लंबी सूची है।
वर्ष 2022 में ‘लंदन-एडिनबर्ग-लंदन’ और ‘नॉर्थ केप-4200’ जैसी कठिन चुनौतियों को पूरा करने वाली वे पहली भारतीय महिला बनीं। इसके साथ ही वे 14 बार ‘एसआर’ (Super Randonneur) का दर्जा प्राप्त कर चुकी हैं। फ्रांस में आयोजित ‘पेरिस-बे-पेरिस’ में उन्होंने 92 घंटों के भीतर 1220 किलोमीटर की साइकिलिंग कर सबको चकित कर दिया था।
साइकिलिंग के प्रति रेणु का समर्पण उनके दैनिक अनुशासन में दिखाई देता है। किसी भी बड़ी प्रतियोगिता में उतरने से पहले वे महीनों तक कठिन अभ्यास करती हैं। वे हर दिन 50 किलोमीटर से अधिक की इंडोर और आउटडोर ट्रेनिंग लेती हैं ताकि कठिन रास्तों और बदलती जलवायु के लिए खुद को तैयार कर सकें। राजस्थान के विभिन्न जिलों में साइकिल चलाकर वे युवाओं, विशेषकर लड़कियों को खेलों की दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित करती हैं।
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रेणु के इस सफर की सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि उन्होंने साइकिलिंग की शुरुआत 51 साल की उम्र में की थी। एक प्रोफेसर के रूप में शुरू हुआ यह शौक आज उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। पिछले 8 सालों में उन्होंने 1 लाख किलोमीटर से अधिक की दूरी साइकिल से तय की है। वर्तमान में वे पूर्णिमा यूनिवर्सिटी की एडवाइजर के रूप में कार्यरत हैं और अपनी सफलता से यह संदेश दे रही हैं कि सपनों को पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती।
