
मिडिल क्लास की कहानियों के सिनेमा के उस्ताद थे बासु चटर्जी
70 और 80 के दशक में जब बड़े बजट और स्टारडम वाली फिल्मों का बोलबाला था, उस दौर में बासु चटर्जी ने आम आदमी की जिंदगी को सिनेमा की भाषा दी। उनकी फिल्मों में शोर नहीं, बल्कि अपनापन था। रिश्ते, रोजमर्रा की परेशानियां और समाज की सच्चाइयों को उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में बड़े असर के साथ पर्दे पर उतारा।
अजमेर से बॉलीवुड तक का सफर
10 जनवरी 1930 को अजमेर में जन्मे बासु चटर्जी ने बतौर डायरेक्टर और स्क्रीनराइटर अपनी अलग पहचान बनाई। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने करीब 18 साल तक कार्टूनिस्ट के तौर पर भी काम किया। ‘तीसरी कसम’ से करियर की शुरुआत करने के बाद ‘सारा आकाश’ जैसी फिल्म बनाई, जिसके लिए उन्हें बेस्ट स्क्रीनप्ले का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला।
सिर्फ 4 साल में बनीं 4 अमर फिल्में
बासु चटर्जी ने महज चार साल के अंतराल में चार ऐसी फिल्में दीं, जो आज भी क्लासिक मानी जाती हैं। ये फिल्में थीं— पिया का घर (1972), रजनीगंधा (1974), छोटी सी बात (1975) और चितचोर (1976)। इन फिल्मों की खासियत यह थी कि इन्हें पूरा परिवार एक साथ बैठकर देख सकता था।
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पिया का घर’: मुंबई की जद्दोजहद की कहानी
1972 में आई पिया का घर एक रोमांटिक कॉमेडी थी, जो मराठी फिल्म मुंबईचा जवाई का रीमेक थी। जया भादुड़ी और अनिल धवन की इस फिल्म ने 70 के दशक के मुंबई के मिडिल क्लास जीवन को बखूबी दिखाया। किशोर कुमार की आवाज में गाया गीत ‘ये जीवन है’ आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है।
‘रजनीगंधा’: रिश्तों की उलझनों का आईना
1974 में रजनीगंधा के जरिए आमोल पालेकर ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा। विद्या सिन्हा के साथ उनकी जोड़ी को खूब पसंद किया गया। मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर आधारित इस फिल्म ने प्रेम में उलझी एक स्त्री की मानसिक स्थिति को बेहद संवेदनशील ढंग से दिखाया। फिल्म को तीन फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले और इसके गाने आज भी कालजयी माने जाते हैं।
‘छोटी सी बात’: सादगी में छुपी बड़ी सफलता
1975 में रिलीज हुई छोटी सी बात एक सॉफ्ट रोमांटिक कॉमेडी थी, जिसमें आमोल पालेकर, विद्या सिन्हा, अशोक कुमार और असरानी नजर आए। सीमित बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की। फिल्म को 6 फिल्मफेयर नॉमिनेशन मिले और बासु चटर्जी को बेस्ट स्क्रीनप्ले का अवॉर्ड मिला।
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‘चितचोर’: संगीत और मासूमियत का संगम
1976 में आई चितचोर बासु चटर्जी की सबसे यादगार फिल्मों में से एक मानी जाती है। आमोल पालेकर और जरीना वहाब की जोड़ी, ग्रामीण पृष्ठभूमि और रविंद्र जैन का सदाबहार संगीत इस फिल्म की जान था। ‘गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा’ के लिए येसुदास को नेशनल अवॉर्ड मिला। फिल्म को कुल दो नेशनल अवॉर्ड और एक फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया।
एक थिएटर से शुरू होकर बनी ब्लॉकबस्टर
दिलचस्प बात यह है कि चितचोर को शुरुआत में मुंबई के सिर्फ एक थिएटर में रिलीज किया गया था। बावजूद इसके फिल्म 100 दिन तक चली और बाद में अन्य सिनेमाघरों में रिलीज हुई। 45 लाख के बजट में बनी इस फिल्म ने 1.15 करोड़ रुपये की वर्ल्डवाइड कमाई कर इतिहास रच दिया।
आज भी जिंदा है बासु चटर्जी का सिनेमा
बासु चटर्जी की ये चारों फिल्में आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं। सुपरस्टार्स के दौर में भी उन्होंने साबित किया कि सच्ची कहानी, संवेदनशील निर्देशन और सादगी से भी सिनेमा अमर बन सकता है।
