
राजस्थान आज आधुनिकता और औद्योगिक प्रगति की एक नई इबारत लिख रहा है, जहाँ विशाल सोलर पार्क, तेल रिफाइनरी और चमचमाते नेशनल हाईवे प्रदेश की नई पहचान बन रहे हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में हो रहा यह अभूतपूर्व विस्तार राज्य को निवेश और रोजगार के नए अवसरों से जोड़ रहा है, जिससे ‘धोरां री धरती’ की आर्थिक तस्वीर बदलती नजर आ रही है। सौर ऊर्जा के उत्पादन में राजस्थान का नेतृत्व करना पूरे देश के लिए गर्व का विषय है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे छिपे कुछ गहरे सवाल अब आम जन और विशेषज्ञों को परेशान करने लगे हैं। प्रगति की इस अंधी दौड़ में सबसे बड़ा खतरा प्रदेश की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत पर मंडरा रहा है। पश्चिमी राजस्थान में सोलर पैनल लगाने के लिए मरुस्थल के गौरव ‘खेजड़ी’ के पेड़ों की बेरहमी से कटाई की जा रही है, जो सदियों से यहाँ के पारिस्थितिकी तंत्र का आधार रहे हैं। इसके साथ ही, ‘ओरण’ के नाम से जानी जाने वाली वे पवित्र भूमियाँ, जो ग्रामीण समुदायों के लिए धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व रखती हैं, अब औद्योगिक प्रोजेक्ट्स की भेंट चढ़ती जा रही हैं। यह न केवल प्रकृति का विनाश है, बल्कि एक पूरी परंपरा का अंत भी है।
विकास का एक और पहलू वन्यजीवों के लिए काल बनकर उभर रहा है
सोलर पार्कों से निकलने वाली विशाल ट्रांसमिशन लाइनों के जाल ने राज्य पक्षी ‘गोडावण’ (Great Indian Bustard) के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। ये दुर्लभ पक्षी अक्सर इन तारों की चपेट में आकर अपनी जान गंवा देते हैं, जिसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने भी गहरी चिंता जताई है। यह विडंबना ही है कि स्वच्छ ऊर्जा (Green Energy) पैदा करने के चक्कर में हम उन जीवों को खो रहे हैं जो हमारी जैव विविधता का अभिन्न हिस्सा हैं। बाड़मेर में निर्माणाधीन रिफाइनरी से जहाँ राजस्थान के राजस्व में भारी वृद्धि की उम्मीद है, वहीं इससे निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट और सह-उत्पादों के प्रबंधन को लेकर भी बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। विशेषज्ञों का डर है कि यदि इन अपशिष्टों का वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से निस्तारण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यहाँ की मिट्टी और हवा जहरीली हो सकती है। विकास का यह मॉडल जन-स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती पेश कर सकता है, जिसका उदाहरण हम पंजाब और हरियाणा के कैंसर बेल्ट के रूप में पहले ही देख चुके हैं।
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नदियों की बात करें तो बजरी खनन के नाम पर उन्हें भीतर तक खोखला किया जा रहा है
तय मानकों का उल्लंघन करते हुए नदियों के तल से अत्यधिक बजरी निकालने के कारण जलभराव और बहाव का प्राकृतिक तंत्र पूरी तरह बिगड़ गया है। इससे न केवल बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, बल्कि नदियों में पनपने वाले जलीय जीवों का जीवन भी असुरक्षित हो गया है। संसाधनों के इस अनियंत्रित दोहन ने प्रकृति के संतुलन को हिलाकर रख दिया है, जिसके दुष्परिणाम भविष्य में बेहद घातक हो सकते हैं। ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘कचरे से बिजली’ बनाने वाले प्लांट भी अब चर्चाओं में हैं। हालाँकि यह कचरा प्रबंधन का एक तरीका दिखता है, लेकिन इनसे निकलने वाली राख में भारी धातुएं होती हैं जो भू-जल को प्रदूषित कर सकती हैं। यदि गीले और सूखे कचरे को अलग किए बिना जलाया जाता है, तो ये प्लांट वातावरण में भारी प्रदूषण फैलाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम केवल समाधान की ओर न देखें, बल्कि उस प्रक्रिया से होने वाले नुकसानों का भी गहराई से आकलन करें।
पर्यावरण विशेषज्ञ और पूर्व आईएफएस डी.एन. पांडे का मानना है कि अरावली की पहाड़ियां राजस्थान के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती हैं, जो वर्षा जल को रोकने और तापमान को संतुलित रखने में सहायक हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि इन पहाड़ियों में खनन इसी तरह जारी रहा, तो भविष्य में भू-जल स्तर खतरनाक रूप से गिर जाएगा और शहरों में ‘हीटवेव’ (भीषण गर्मी) तथा धूल के गुबारों का संकट और अधिक गहरा जाएगा, जिससे खेती और जनजीवन दोनों प्रभावित होंगे।
वहीं, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के वाइल्ड लाइफ रिसर्च सेंटर के निदेशक हेम सिंह गहलोत का कहना है कि सोलर पार्कों के लिए ओरण और चरागाह भूमि का उपयोग करना वन्यजीवों के गलियारों को नष्ट कर रहा है। उन्होंने विशेष रूप से जोर देकर यह सुझाव दिया है कि सोलर प्लांटों के आस-पास या उनके बीच के खाली हिस्सों में स्थानीय और संरक्षित प्रजातियों के पेड़ लगाए जाने चाहिए, ताकि विकास के साथ-साथ पक्षियों और वन्यजीवों को सुरक्षित आवास मिल सके और प्रकृति का संतुलन बना रहे।
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इसके अतिरिक्त, पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक सी.एस. पाराशर ने विकास के मॉडल पर अपनी राय देते हुए स्पष्ट किया है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन ही हमारे टिकाऊ भविष्य की असली कुंजी है। उन्होंने कहा कि हर नए प्रोजेक्ट को ‘सस्टेनेबल डवलपमेंट’ (सतत विकास) की अवधारणा से जोड़ा जाना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, किसी भी बड़ी परियोजना को लागू करते समय स्थानीय पर्यावरण, परंपरागत ज्ञान, जैव विविधता और आम जनता के स्वास्थ्य को साथ लेकर चलना ही वास्तविक प्रगति कहलाएगी।
