
दिल्ली में ‘जादूगर’ और ‘पायलट’ का मेल
कांग्रेस मुख्यालय, दिल्ली में बुधवार को एक ऐसा नजारा देखने को मिला जिसने राजस्थान की राजनीति में हलचल मचा दी है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट न केवल एक साथ नजर आए, बल्कि मीडिया के सामने मुस्कुराते हुए हाथ भी मिलाया। गहलोत ने चुटीले अंदाज में कहा, “आप लोग कहते हो हमारी बनती नहीं, देख लो कितनी बनती है,” जिस पर पायलट ने भी हंसते हुए जवाब दिया कि “गहलोत साहब तो मुझसे मिलने पीछे-पीछे आए हैं।” यह मुलाकात इसलिए अहम है क्योंकि 2022 के मानेसर कांड और ‘गद्दार’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल के बाद दोनों के बीच ‘तलवारें खिंच’ गई थीं, जिसका खामियाजा पार्टी को 2023 के विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ा था।
आलाकमान का ‘फोर्गिव एंड फॉरगेट’ फॉर्मूला
सूत्रों की मानें तो कांग्रेस आलाकमान ने 2028 के राजस्थान विधानसभा चुनावों को देखते हुए दोनों दिग्गजों के बीच सुलह की नई बुनियाद रखी है। मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की मौजूदगी में हुई बैठकों में यह साफ कर दिया गया कि राजस्थान में जीत के लिए गहलोत का ‘अनुभव’ और पायलट का ‘युवा जोश’ दोनों अनिवार्य हैं। चर्चा है कि एक गुप्त समझौते के तहत सचिन पायलट को जल्द ही राजस्थान कांग्रेस की कमान (प्रदेश अध्यक्ष या संभावित सीएम फेस) सौंपी जा सकती है, जबकि अशोक गहलोत को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका देकर दिल्ली शिफ्ट करने की योजना है। दोनों नेताओं को स्पष्ट हिदायत दी गई है कि वे सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी नहीं करेंगे।
सियासी तल्खी और हालिया जुबानी जंग
भले ही दिल्ली में कैमरों के सामने केमिस्ट्री शानदार नजर आई, लेकिन राजस्थान की जमीनी हकीकत अब भी पेचीदा है। महज कुछ दिन पहले ही 14 अप्रैल को नागौर में अशोक गहलोत ने बिना नाम लिए पायलट पर निशाना साधते हुए मानेसर प्रकरण के ‘पुराने जख्मों’ को कुरेदा था। उस वक्त उन्होंने सरकार गिराने की कोशिशों का दर्द बयां किया था, जबकि उसी दिन पायलट जयपुर में कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय थे। राजनीति के जानकारों का मानना है कि दोनों नेताओं के बीच की यह ‘दोस्ती’ फिलहाल केवल एक ‘सीजफायर’ (युद्धविराम) है, क्योंकि असली लड़ाई राजस्थान की सत्ता की बागडोर अपने हाथ में रखने की है।
2028 का अग्निपथ और साख की लड़ाई
राजस्थान में भाजपा के मजबूत सांगठनिक ढांचे को देखते हुए कांग्रेस अब और बिखराव बर्दाश्त नहीं कर सकती। राहुल गांधी द्वारा दोनों नेताओं को पार्टी का ‘एसेट’ बताए जाने के बाद अब एकजुटता का संदेश देना मजबूरी बन गया है। सचिन पायलट का कद जिस तरह से बढ़ रहा है और प्रदेश अध्यक्ष की रेस में उनका नाम सबसे आगे है, उससे गहलोत खेमे में भी सक्रियता बढ़ गई है। अब सारा दारोमदार इस बात पर है कि दिल्ली की यह ‘मुस्कुराती तस्वीर’ राजस्थान की तपती सियासत में कितनी टिक पाती है। क्या 2028 के चुनाव तक यह केमिस्ट्री बनी रहेगी या कुर्सी की चाहत एक बार फिर पुरानी कड़वाहट को सतह पर ले आएगी, यह भविष्य के गर्भ में है।
