
प्रत्येक वर्ष के समान नीट यू जी सी 2026 की परीक्षा 3 मई 2026 को हुई । पेपर लीक होने के कारण 12 मई 2026 को यह अति महत्वपूर्ण परीक्षा रद्द कर दी गई और जाँच सी बी आई को सौंप दी गई। इसके बाद वायु सेना की सहायता से यह परीक्षा पुनः आयोजित की गई। इस परीक्षा में भी अनेक छात्र बैठे और इसका परिणाम भी घोषित कर दिया गया है । उत्तीर्ण छात्र सोशल मीडिया में अपनी फोटो डाल कर सभी का आशीर्वाद और शुभकामनाएँ बटोर रहें हैं ! प्रसन्न हो भी क्यों न ! यदि पेपर रद्द न होता तो शायद उनको सफलता न मिलती । लेकिन उन निर्दोष छात्रो का क्या जो पिछले एक साल , दो सालों या संभवतः तीन सालों से आँखों में डाक्टर बनने का सपना लिए कमरतोड़ मेहनत कर रहे थे और उन्हे विश्वास था कि इस बार वो अवश्य सफल होंगे ? या उन छात्रों का क्या जो बिना किसी दोष के पेपर लीक होने के कारण इतने हताहत हुए कि गहरे अवसाद में चले गए और उनमें से कइयों ने आत्महत्या तक कर ली ? क्या हमारे युवाओं का जीवन इतना सस्ता है ।संवैधानिक रूप से , प्रशासनिक रूप से , मानवीय रूप से क्या जनता द्वारा चुनी गई सरकार का यह दायित्व नही है कि वो नीट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा के प्रश्न पत्र के लीक होने का दोष चंद कोचिंग सैन्टरों के मालिकों या प्रश्न पत्र बनाने वाले पैनल पर मढ़ दे और स्वयं अपना पल्ला झाड़ दे ? यह कोई एकाकी घटना नही है । आए दिन हम विभिन्न प्रदेशों से परीक्षाओं के लीक होनें का समाचार सुनते ही रहते हैं ।
ऐसी स्थिति में यू पी ऐस सी की अन्य महत्वपूर्ण परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर भी संदेह होना स्वाभाविक है । युवाओ के जीवन के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ और सरकार द्वारा कोई ठोस कार्यवाही नही ! देश के अधिकांश युवा पहले ही घोर आरक्षण और बेरोजगारी की मार झेल रहें हैं और ऊपर से अब परीक्षाएँ आयोजन करनें वाली सरकारी तंत्रों की सत्यनिष्ठा पर ही गंभीर प्रश्नचिन्ह लग रहें हैं ! यह स्वतंत्र भारत में राष्ट्र के भविष्य का निर्धारण करने वाले युवाओं के स्वप्नों की , उनके हौसलों की और उनके जीने के अधिकारों की हत्या नही तो और क्या है ?
उपरोक्त प्रश्न नुकीले हैं और चीख चीख कर उत्तर माँग रहें हैं किंतु समुचित उत्तर नदारद हैं। भारत की शैक्षणिक व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे शिक्षा मंत्री का यह कर्तव्य था कि वो इन संजीदा हालातों पर अपना वक्तव्य भी देते और इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण का नैतिक उत्तरदायित्व लेते हुए त्यागपत्र भी देते । किंतु सरकार की ओर से संवेदना के दो शब्द भी नही आए । फलस्वरूप युवाओं का क्रोध फूटना स्वाभाविक था । भारत एक लोकतांत्रिक व कल्याणकारी देश है। यहाँ न्याय पाने का अधिकार सबको है । अपनी प्रतिभा और योग्यता के अनुसार स्वर्णिम अवसरों को तलाशने का अधिकार भी सबको है । जब चहुँ ओर कभी आरक्षण के नाम पर और कभी शिक्षा प्रणाली में होती धांधलियों के कारण युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ किया जाता है तो आक्रोश का जन्म लेना स्वाभाविक है। इतिहास साक्षी है कि युवा शक्ति जब सैलाब का रूप लेती है तो कोई ताकत उसे दबा सकती ही नही किंतु ऐसा तभी होता है जब उसमें जज्बा हो , सच्चाई हो , एकता हो और शुद्धता हो ! नीट के पेपर का लीक होना एक चिंगारी मात्र थी – पहले भी कितनी ही बार पेपर लीक हुए हैं और इनके पीछे कोचिंग सैन्टरों का गोरखधंधा तो है ही , साथ ही बड़े बड़े तथाकथित बड़े बड़े मगरमच्छों का भी हाथ है । सरकार की ठीक नाक के नीचे इन कोचिंग सैन्टरों का काला कारोबार फलफूल रहा है । शिक्षा एक व्यवसाय बन कर रह गई है । ऐसी स्थिति मे जब प्रश्न पत्र ही लीक होने लगें तो स्थिति भयावह हो जाती है। और जब कोई राह नही सूझती तो हृदयों का नैराश्य आक्रोश का रूप लेता है , जन आंदोलन का रूप लेता है ! अपने हृदय के आक्रोश को सरकार तक प्रदर्शन के माध्यम से पहुँचाने के लिए युवा छात्रों ने दिल्ली का जन्तर-मन्तर चुना । फिर क्या था ? जंतर मतंर पर युवा इकठ्ठे होने शुरू हो गए।
किंतु दुर्भाग्यपूर्ण स्तिथि तब बनी जब अधिकतर छात्र दिशाहीन से लगे या गलत तत्वों के हाथ में खिलौना मात्र बनने लगे । भारत के मुख्य न्यायधीश के कथन मे से एक शब्द कॉकरोच उठाया गया और अमरीका निवासी अभिजीत दिपके द्वारा कॉकरोच जनता पार्टी का निर्माण हुआ। देखते देखते सोशल मीडिया पर सी जे पी के लाखों फौलोअर्स बन गए जिनमें से पाकिस्तान और बांग्लादेश के भी भी काफी फौलोअर्स हैं। जब नीट का पेपर लीक हुआ तो यह मुद्दा कॉकरोच जनता पार्टी का मुख्य एजेंडा बन गया जो पहले से ही जंतर मंतर पर धरने पर बैठी थी । अब सी जे पी और नीट पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कारी युवा दोनो मिल गए। फिर इस परिदृश्य में सोनम वांगचुक का आगमन होता है । सोनम वांगचुक जी छात्रों की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठते हैं जो निसंदेह प्रशंसनीय था । महात्मा गाँधी भी अनशन पर बैठते थे , भूख हड़ताल पर बैठते थे । किंतु फिर धीरे धीरे उसी जंतर मंतर पर ऐसे लोगों का जमावड़ा होना शुरू हो गया जिनका छात्रो के हितो से कोई लेना देना नही था । धीरे धीरे नीट परीक्षा का मसला पीछे होता गया और जो नारे गूँजने लगे वो राष्ट्र विरोधी तो हैं ही , साथ मे अमर्यादित भी हैं! भारतीय परिधान साड़ी धारिणी , बड़ी सी बिंदी लगा कर एक महिला माइक पर चीख चीख कर बेशर्मी से कह रही है ,” भारतमाता तो इनको मिल गई है , अब ये अपना बाप ढ़ूँढ़ रहें हैं।” बात यहीं तक नही रही ! भारत की चिकन नैक को काटने की वकालत करने वाले शरजिल इमाम को सही ठहराया जाने लगा ,अल्लाह के गीत गीत गाए जानें लगे , भगवान श्री राम पर अभद्र टिप्पणियाँ कर के करोड़ो लोगो की आस्था को हताहत किया जाने लगा ।
ये आंदोलन है या कोई छ्द्म एजेंडा है ? जब ऐसे शातिर लोगों के नेतृत्व मे भोले भाले छात्रो की भीड़ में शामिल हुए अराजक तत्व मिल कर बीस जुलाई को संसद का घेराव करने हेतु जुलूस के रूप मे आगे बढ़ते हैं ऐसे दृष्य देखने को मिलते हैं जो आत्मा को आहत कर दें । छात्रों के ऊपर लाठियाँ बरसाई गई , अश्रुगैस के गोले छोड़े गए , बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया ! इस छात्र आंदोलन में शामिल राजनैतिक लोगों का संबंध उन छात्रों की व्यथा से कहाँ है जो जर्जर शैक्षणिक व्यवस्था के शिकार बने ? स्पष्ट है कि छात्रों के आंदोलन को हाइजैक करने षडयंत्र का किया जा रहा है और उस पर छात्र हित का मुलम्मा चढ़ाया जा रहा है । जो राजनैतिक पार्टियाँ अपनी जमीन खो बैठी हैं उनके नेता जंतर-मंतर पर पहुँच गए। जो नए राजनैतिक दल या छुटभयै नेता अपनी ज़मीन ढ़ूँढ़ रहें हैं वो भी बड़ी होशियारी से कॉकरोच जनता पार्टी के मंच का प्रयोग कर रहे हैं । हाथों मे संविधान है और कश्मीर में पुनः धारा 370 को लाने की माँग है । धारा 370 का छात्रों के भविष्य और नीट परीक्षा से क्या लेना देना ? कहने को तो कॉकरोच जनता पार्टी नीट प्रश्न पत्र के लीक होने के कारण पीड़ित छात्रों की आवाज़ उठाने के लिए जंतर मंतर पर एकजुट हुई किंतु उस मंच से उठने वाली आवाज़े किसी भी जागरुक नागरिक को चिंता में डाल सकती है ? ” मेरा लिंग मेरी मर्जी , मेरे कपड़े मेरी मर्जी !” ठीक है ! सब आपकी मर्ज़ी तो परिवार का क्या ? समाज का क्या ? यदि सारे अधिकार चाहिए तो उन अधिकारों से जुड़े कर्तव्यों का क्या ? और फिर इन नारों का नीट परीक्षा के लीक हुए परीक्षा पत्र के कारण पीड़ित छात्रों की व्यथा से क्या ? नंदिता नारायण नाम की एक मोहतरमा हैं जो सेंट स्टीफन की सेवानिवृत्त प्राध्यापिका हैं , वो सी जे पी के मंच पर सवार होकर अल्लाह का गीत गा रही हैं और उस गीत को उच्चतम वेदांता कह रहीं हैं । बहुत ही उत्तम बात है ।
अल्लाह और वेदांता को जोड़ने वाली इस विदुषी महिला को तो भारत रत्न मिलना चाहिए किंतु इस महान महिला के इस महान कथन का छात्रों की पीड़ा से और शैक्षणिक व्यवस्था में सुधारों की नितांत आवश्यकता से आखिर क्या लेना देना ? एक और हास्य कलाकार कुणाल कामरा सी जे पी के मंच पर आए और ” सीता नीता” को मिलाकर चले गए! आसपास खड़े दर्शक खीं खीं कर के हँस रहें थे । वो क्या पीड़ित छात्रों की हँसी हो सकती है भला ? प्रेमचन्द महाराज की बातों से कोई सहमत हो या न हो किंतु उनके लिए भी सी जे पी के मंच से अपमान भरे शब्द कहे गए और इस अपमान का शिक्षा व्यवस्था से क्या लेना देना ? आर ऐस ऐस मुर्दाबाद का शिक्षा व्यवस्था से क्या लेना देना ? शरजिल इमाम का समर्थन करने वाले छात्रों मे से अधिकांश को पूर्वोत्तर भारत के चिकन नैक का सामरिक महत्व ही नही मालूम तो फिर शरजिल इमाम के समर्थन का नीट पेपर से क्या लेना देना ?
हाँ, निसंदेह राष्ट्रविरोधी तत्वो का इन तमाम मुद्दों से गहरा संबंध है और छात्र आंदोलन की आड़ मे ये सभी देश विरोधी ताकतें अपनी अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकनें जंतर मंतर पहुँच चुकी हैं – उनमें अंरुंधति राय और निवेदिता मैनन जैसी नारी शक्तियाँ भी हैं जिन्होंने कश्मीर को भारत का अंग मानने से भी इंकार कर दिया था। इन्होंने कहाँ बच्चों के हित में एक भी बयान दिए हैं ? सी जे पी के मंच से सी ए और ऐन आर सी के समर्थन मे नारेबाजी हो रही है – राष्ट्रीय सुरक्षा के इन मुद्दों का नीट परीक्षा से क्या संबंध ? निश्चित रूप से छात्रों के तर्कसंगत आंदोलन को अराजक और राष्ट्रविरोधी ताकतों ने घेर लिया है और ये भोले-भाले छात्रों का प्रयोग अपनी गंदी राजनीति व राष्ट्रविरोधी मंसूबों की पूर्ति के लिए कर रहें हैं । वहाँ से तभी तो ऐसे गंदे गंदे नारे गूँज रहें हैं जो एक सभ्य शालीन व्यक्ति न तो अपने कानों से सुन सकता है और न अपनी जुबान से बोल सकता है। ऐसे में चिर युवा व क्रांतिकारियों के सरताज सरदार भगत सिंह का उदाहरण हमारे समक्ष है जिन्होनें अंग्रेजी हुकूमत की चूलें तक हिला दीं किंतु उन्होनें कभी भी किसी भी प्रकार की गंदी शब्दावली का प्रयोग अंग्रेजो के लिए भी नही किया । भगत सिंह भी नास्तिक थे किंतु उन्होनें किसी भी धर्म के प्रति ऐसी ओछी वाणी नही बोली जैसी सी जे पी के मंच से बोली जा रही है ।देशभक्तों के सरदार सुभाष चन्द्र बोस के महात्मा गाँधी से गंभीर राजनैतिक मतभेद थे । महात्मा गाँधी के ही कारण महान सैनानी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और भारत भूमि को छोड आजाद हिंद फौज के निर्माण हेतु उन खतरनाक राहों पर चल दिए जहाँ कदम कदम पर मौत के शोले धधक रहे थे किंतु फिर भी उन्होंने कभी भी महात्मा गाँधी का अपमान नही किया । ये तथाकथित बुद्धिजीवी , नेता , राजनैतिक पार्टियाँ, ऐन जी ओ , सामाजिक कार्यकर्ता सुभाषचंद्र बोस , भगत सिंह , स्वामी विवेकानंद , ए पी जे अब्दुल कलाम, अरविंद घोष आदि राष्ट्रीय महानायकों का उदाहरण देकर युवाओं का मार्गदर्शन क्यों नही कर रहें हैं ? जिस प्रकार के ओछेपन और भौंडेपन के नारे लगाए जा रहें हैं उसे किसी भी धर्म
का कोई भी परिवार नही स्वीकारेगा। ” मेरा लिंग मेरा अधिकार ” – कौन सा भारतीय परिवार अपने नौनिहालों के मुख से ऐसे ओजस्वी कथन सुनना चाहेगा भला ?
युवाओं को सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है न कि अर्नगल, अनैतिक , अपराधिक नारों की ! युवा तो बेचारे चहुँ ओर से शोषित हो रहें हैं – जर्जर शैक्षणिक व्यवस्थाओं से , नेताओं से , बुद्धिजीवियों से , स्वार्थ लिप्त सामाजिक संस्थानों से ! बेरोजगारी से ! आरक्षण से ! इन मुद्दो पर कोई बात नही ! बात अल्लाह की ! बात माता सीता की ! बात प्रेमानंद जी महाराज की ! बात धारा 370 की ! बात योगी को हटाने की ! बात भारत को नेपाल और बांग्लादेश बनानें की !
अब बात सोनम वांगचुक जी की ! निसंदेह लद्दाख के खुशनुमा मौसम को छोड़कर दिल्ली की गर्मी मे आना और न केवल आना बल्कि छात्रों के लिए , शिक्षामंत्री के त्यागपत्र हेतु भूख हड़ताल पर बैठना एक साहसिक कार्य है । लेकिन ऊपर की चमक के पीछे भी बहुत कुछ छिपा होता है जिसे जानना अत्यंत आवश्यक है । यदि हम इतिहास को खंगाले तो हम पाएँगे कि किसी भी कालजयी महान नेता का एक कथन मात्र उसके समूचे व्यक्तित्व की पहचान बन जाता है जैसे सुभाष चंद्र बोस ने युवाओं की आँखों मे आँखें डालकर सीधे सीधे कहा था – ” तुम मुझे खून दो , मै तुम्हे आजादी दूँगा ।” या बाल गंगाधर तिलक का अमर वाक्य ,” स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।” या स्वामी विवेकानंद जी का ओज भरा कथन , ” गर्व से कहो कि मैं भारतीय हूँ।” ये वाक्य महज वाक्य नही हैं बल्कि विराट व्यक्तित्व रखनें वाले महान नेताओं के स्मृति चिन्ह है और दूसरी ओर सोनम वांगचुक जी के पॉडकास्ट सुनिए जिसमें वो यह कह रहे हैं कि यदि उन्हे संरक्षण नही मिला तो वो चीनियों को लद्दाख में घुसनें का रास्ता दिखा देंगे । अर्थात वो एक प्रकार से भारतीय सेना की उपस्थिति और लद्दाख को बचाने मे वीर जवानों के बलिदानों को भी नकार रहें है । उनके उद्देश्य चाहे कितने ही महान हो , उनकी उपलब्धियाँ चाहे कितनी ही विशिष्ट हो , अपने राष्ट्र की भूमि चीनियों के हाथों सौंपने की वो सोच भी कैसे सकते हैं ? इसी प्रकार एक और पौडकास्ट में वो कह रहें हैं कि कश्मीर मे जनमत कराना चाहिए और यदि वहाँ के नागरिक पाकिस्तान में जाना चाहें तो कश्मीर पाकिस्तान को दे देना चाहिए ।
क्या ऐसी हिमाकत राजद्रोह नही ? क्या इसके लिए वो कठोर दंड के अधिकारी नही ? सोनम वांगचुक देश की संप्रभुता के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं। पुनः सोनम वांगचुक जी का एक और पॉडकास्ट है जिसमें वो कहते हैं कि राम ने सीता को रावण से छुड़ाकर बाजार में बेचने के लिए छोड़ दिया – पूरे विश्व मे फैले करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर इतनी घिनौनी बात कहनें वाले तथाकथित बुद्धिजीवी व्यक्ति को क्या सामाजिक व धार्मिक समरसता को भंग करने के प्रयास मे दंड नही मिलना चाहिए ? ऐसा नेता क्या भारत के युवाओं का मार्गदर्शन करेगा ? सोनम वांगचुक एक आंदोलनमुखी प्रजाति के पराजीव हैं जिसे सी जे पी के मंच से युवाओं का मसीहा बनने का स्वर्णिम अवसर मिला और भोले भाले युवाओं ने उनके अतीत को जाने बिना ही उन्हे अपना सिरमौर बना लिया । सरकारी आंकड़ो के अनुसार सोनम जी एक ऐन जी ओ चलाते रहे हैं और इसके लिए केन्द्र सरकार ने उन्हे धन , भूमि आदि सभी मुहैया करवाई । इस ऐन जी ओ को काफी विदेशी फंडिंग भी मिलती रही है । किंतु इसके लिए उन्होने किसी भी सरकारी प्रतिमान को पूरा नही किया और इसके साथ ही वित्तीय अनियमितताएं भी बरतीं जिस कारण उनके भूमि आवंटन को रद्द कर दिया गया । विदेशी फंडिंग नियमों के उल्लंघन के कारण उनकी ऐन जी ओ का ऐफ सी आर ए रद्द कर दिया गया।
इसके अतिरिक्त उनका एक शिक्षण संस्थान है – हिमालयन इंस्टीट्यूट आफ आल्टरनेटिव्स – इस शिक्षण संस्थान को सोनम वांगचुक जी बिना यू जी सी से मान्यता प्राप्त किए चलाते रहे और डिग्रियाँ भी बाँटते रहे । बाद मे जिस लद्दाख का वो दम भरते हैं उसी लद्दाख के बच्चो को पता चला कि सोनम जी के संस्थान द्वारा दी गई डिग्रियाँ फर्जी हैं तो सोनम जी ने इस बात पर मिट्टी डालने हेतु लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलवाने की मुहिम चला दी । करीब तीन लाख की आबादी वाले लद्दाख से दस हजार लोग भी वांगचुक के समर्थन मे सड़को पर नही आए । आज जब जम्मू-कश्मीर मे शांति है , फौज पर पत्थरबाजी नही हो रही है , बोर्डर पार फायरिंग में हमारे सैनिक शहीद नही हो रहे हैं तो सोनम वांगचुक जी उस इलाके की शांति और स्थिरता को भंग करने के लिए लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलवाने की माँग करके पुनः अराजकता फैलाना चाहते है? वैसे भी सोनम वांगचुक कोई साधारण व्यक्ति नही हैं। उनकी एक राजनैतिक पृष्ठभूमि है।
उनके पिता , सोनम वागयाल,नैशनल कान्फ्रेंस के एक प्रमुख नेता रहें हैं और 1975 में शेख अब्दुल्ला की सरकार मे कैबिनेट मंत्री भी रहें हैं । यही कारण है कि सोनम वांगचुक ने या उनके परिवार ने कभी भी कश्मीर मे हुए भयंकर नर संहार की भर्त्सना नही की। इस आंदोलन मे भी सोनम वांगचुक जी अपने आसपास उन लोगो का जमावड़ा लगाए हुए हैं जो जय भीम का नारा लगा रहे हैं , भगवान राम को गाली दे रहें है , सनातन का अपमान कर रहें हैं ! या जिन्होनें भारत को टुकड़ो टुकड़ों में बाँटने की हसरत पाल रखी है ! इससे कौन से छात्रों का हित हो रहा है ?
इस सारे बवंडर में पीड़ित छात्रों की कहीं बात ही नही हुई ।समाधानों की कहीं बात ही नही हुई । छात्र तो दोहरी मार झेल रहें हैं । उनका रोष तर्कसंगत है । यदि सरकार छात्रो के इस मसले को संवेदना के साथ सुनती तो अराजक व राष्ट्रविरोधी तत्वों को अपनी रोटियाँ सेकने का अवसर न मिलता । इस पर सरकार की कठोरता ने मामले को और अधिक संगीन बना दिया । अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 23 जुलाई 2026 को रात 12 बजे छात्रों को संबोधित किया और घोषणा की कि पेपर लीक मामले मे सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी , मृतक बच्चो के माँ बाप को वित्तीय मुआवजा दिया जाएगा , आंदोलन मे लिप्त छात्रों के खिलाफ केस वापिस ले लिए जाएंगे और पेपर लीक पर संसद मे न केवल चर्चा होगी बल्कि सख्त कानून भी बनेगा । दूसरे दिन वांगचुक जी ने अपने उपवास को भाजपा नेता जे पी नड्डा जी द्वारा दिए गए जूस को पीकर तोड़ा । इसके साथ ही 25 जुलाई को धर्मेन्द्र प्रधान ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र भी दे दिया ।घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है। किंतु मूलभूत प्रश्न वहीं का वहीं है – अपने हक की आवाज उठा रहे और पुलिस के हाथों हिंसा का शिकार बनें भोले भाले छात्रों को क्या सच्चा इंसाफ मिलेगा ? क्या शिक्षामंत्री के त्यागपत्र से शिक्षा व्यवस्था मे सुधार हो जाएगा ?
यदि सरकार सच में युवाओं का हित चाहती है तो शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन की नितांत आवश्यकता है। सरकार को कुकरमुत्तों के समान उग आए कोचिंग सैंटरो पर लगाम कसनी चाहिए । छोटे छोटे दड़बेनुमा कमरों में कोचिंग के नाम पर ठगी के अड्डे खुल गए हैं । आए दिन वहाँ आग लगने की खबरें आ रहीं हैं , बच्चे झुलस कर मर रहें हैं ! ये कैसी शिक्षा प्रणाली है ? निश्चित रूप से सरकार की जवाबदेही तो बनती है और जब सरकार लोकतांत्रिक हो तो और भी अधिक बनती है। यदि सरकार अपने उत्तरदायित्व निभाने में विफल होती है और हठी बनी रहती है तो आक्रोश भी होगा , आंदोलन भी होंगे और उस आंदोलन की आड़ मे अराजक तत्व भी होंगे , राष्ट्र विरोधी एजैंडे भी होंगे।
सरकार गंभीरता से इस संवेदनशील मसले को हल करे – इसी में पूरे समाज और राष्ट्र की भलाई है । सरकार बलपूर्वक यदि एक आंदोलन दबा देगी तो और चिंगारियां जन्म लेंगी , और आंदोलन जन्म लेंगे । ऊपर से ये नीट पेर लीक का मसला है किंतु छात्र आक्रोश के कई कारण हैं। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को राष्ट्रीय स्वरूप देना होगा और उसे स्किल बेस्ड बनाना होगा जिसमें भ्रष्टाचार और आरक्षण का न्यूनतम स्थान हो । इसके अतिरिक्त हमारे देश के कानून में पेपर लीक करने वाले अपराधियों के खिलाफ सख्त से सख्त दंड का प्रावधान होना चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा कुचक्र है जिसमें पेपर सैटिंग करने वाले अध्यापकों से लेकर शिक्षा अधिकारी और अन्य बड़े सरकारी कर्मचारी व कई बड़े लोग आदि भी शामिल रहतें हैं । इस कुचक्र को हमेशा के लिए तोड़ना ही समय की माँग है। इसके साथ ही युवाओं को कोई भी आंदोलन वृहद स्तर पर करनें से पहले बारीकी से आत्म मंथन करना चाहिए। केवल उन्माद के सहारे कोई भी आंदोलन नही किया जा सकता । आंदोलनो के लिए सर्वप्रथम विश्व की वैचारिक क्रांतियों का अध्ययन करना पड़ता है , वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करनी पड़ती है , मजबूत संगठन बनाना होता है और सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य – आंदोलन का नेता ऐसा हो जिस पर कोई उंगली न उठा सके । छात्र स्वयं मे से ही नेता चुनें और तथाकथित स्वार्थी नेताओं, राजनैतिक पार्टियों,अभिनेताओं,अपराधियों आदि के गलत मंसूबो व खतरनाक एजेंडो से खुद को बचा कर रखें । वो अध्ययन करें, अपने विवेक का प्रयोग करें , संगठन तैयार करने पर वृहद स्तर पर कार्य करें ! रीलें और ढपलियाँ सही हैं किंतु प्रबुद्ध छात्रों को यह भी समझना चाहिए कि वही आंदोलन क्रांतियों का रूप लेतें हैं जो घटियापन और मर्यादाहीन नारों से नही बल्कि उदात्त विचारों से , मजबूत संगठन से , प्रबल इच्छाशक्ति से और कर्मठ व निस्वार्थ नेतृत्व से फलीभूत होतें हैं । इसी दिशा में हमारे आज के युवाओं को बढ़ना होगा , तभी वो सच्चे अर्थों में भारत के भाग्य विधाता और युग प्रवर्तक बन पाएँगे ।
द्वारा डा. प्रीता पॅंवार
फरीदाबाद
