
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मिलेट्स को ‘श्रीअन्न’ का नाम दिए जाने और इसे वैश्विक स्तर पर ‘सुपर फूड’ के रूप में स्थापित करने के प्रयासों का असर अब धरातल पर दिखने लगा है। कृषि विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान वर्तमान में देश के कुल मिलेट्स उत्पादन का अकेले 40 फीसदी हिस्सा पैदा कर रहा है। विशेष रूप से अजमेर जिले में पिछले पांच वर्षों के दौरान इसके उत्पादन में 10 प्रतिशत की सराहनीय वृद्धि दर्ज की गई है। नए साल के अवसर पर आयोजित एक विशेष कार्यशाला में कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बाजरा और ज्वार जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ सांवा, कुटकी, रागी और कोदो जैसे पोषक तत्वों से भरपूर अनाजों की खेती का रकबा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।
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कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक संजय तनेजा ने मिलेट्स की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए इसे ‘पावर ऑफ न्यूट्रिशन’ करार दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि गेहूं और चावल की तुलना में श्रीअन्न कहीं अधिक पौष्टिक है, क्योंकि यह ग्लूटेन-मुक्त होने के साथ-साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। यह अनाज विशेष रूप से मधुमेह और मोटापे जैसी आधुनिक जीवनशैली की बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए एक वरदान की तरह है। कार्यशाला के माध्यम से जन-जन तक यह संदेश पहुँचाया जा रहा है कि मिलेट्स न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर हैं, बल्कि इनमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल्स शरीर को भीतर से मजबूती प्रदान करते हैं।
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आर्थिक मोर्चे पर भी मिलेट्स ने किसानों की तकदीर बदलनी शुरू कर दी है। पिछले दो दशकों का तुलनात्मक अध्ययन करें तो जहां 20 साल पहले बाजरे की कीमत गेहूं के मुकाबले बेहद कम थी, वहीं आज सरकारी समर्थन मूल्य और बढ़ती वैश्विक मांग के कारण बाजरा और गेहूं के दाम लगभग बराबर स्तर पर आ गए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्यात के बढ़ते अवसरों और जोधपुर-जालौर जैसे क्षेत्रों में राजगीरा जैसी नई फसलों के प्रयोग ने किसानों के लिए मुनाफे के नए द्वार खोल दिए हैं। सरकार की इस पहल का मुख्य उद्देश्य उत्पादन और खपत दोनों स्तरों पर जागरूकता लाना है, ताकि राजस्थान के इस गौरवशाली अन्न को हर थाली का अनिवार्य हिस्सा बनाया जा सके।
