
अजमेर की प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह परिसर में शिव मंदिर होने के दावे को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में एक नया मोड़ आया है। शनिवार को इस मामले में सिविल कोर्ट में महत्वपूर्ण बहस होनी थी, लेकिन स्थानीय वकीलों द्वारा कार्य स्थगन (वर्क सस्पेंड) किए जाने के कारण अदालती कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ाया जा सका। इस स्थिति को देखते हुए न्यायालय ने अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 फरवरी 2026 की नई तारीख निर्धारित की है।
सुनवाई की तारीख होने के कारण अदालत परिसर में सुबह से ही सुरक्षा के कड़े इंतजाम देखे गए। किसी भी संभावित तनाव या अप्रिय घटना को रोकने के लिए पुलिस ने भारी जाब्ता तैनात किया था, जिसकी निगरानी स्वयं सीओ शिवम जोशी कर रहे थे। मौके पर हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता, पूर्व विधायक ज्ञानदेव आहूजा और वरिष्ठ अधिवक्ता मौजूद रहे। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कानूनी प्रक्रिया के दौरान शहर का सांप्रदायिक सौहार्द और शांति व्यवस्था पूरी तरह बरकरार रहे।
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इस कानूनी विवाद का मुख्य आधार हिंदू सेना द्वारा दायर वह याचिका है, जिसमें दरगाह परिसर के भीतर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से वैज्ञानिक सर्वे कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि दरगाह के ढांचे के नीचे प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेष दबे हुए हैं, जिनकी ऐतिहासिक जांच जरूरी है। इसके उलट, मुस्लिम पक्ष की अंजुमन कमेटी ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991’ का स्पष्ट उल्लंघन बताया है। कमेटी का कहना है कि यह याचिका केवल धार्मिक भावनाओं को भड़काने और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का एक जरिया है।
कानूनी पक्ष पर स्पष्टीकरण देते हुए वकील संदीप शर्मा ने बताया कि वकीलों की हड़ताल के कारण आज कोई प्रभावी दलील पेश नहीं हो सकी। उन्होंने यह भी जानकारी साझा की कि दरगाह उर्स के दौरान वीआईपी चादर पेश करने से संबंधित मामला अब सिविल कोर्ट से वापस ले लिया गया है, हालांकि ऑर्डर 7 नियम 11 से जुड़े कुछ तकनीकी कानूनी पहलू अभी भी अदालत के समक्ष लंबित हैं। अब सभी पक्षों की नजरें 21 फरवरी 2026 पर टिकी हैं, जब इस संवेदनशील मुद्दे पर कोर्ट पुनः विचार करेगा।
