
दुनियाभर में तेजी से बढ़ती बेरोजगारी, रोजगार असंतुलन और आर्थिक अस्थिरता को लेकर चिंताओं के बीच एक नया आर्थिक मॉडल चर्चा में आया है, जिसे भविष्य के वैश्विक रोजगार संकट के संभावित समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
ह्यूमन कैपिटल मोनेटाइजेशन इकोनॉमिक सिस्टम (HRMES) के संस्थापक दीपक शर्मा ने विश्व बैंक समूह के अध्यक्ष Ajay Banga को संबोधित एक अपील पत्र में वैश्विक स्तर पर संभावित रोजगार संकट से निपटने के लिए नई आर्थिक नीतियों और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया है।
शर्मा ने विभिन्न वैश्विक अनुमानों का उल्लेख करते हुए कहा कि आने वाले 10 से 15 वर्षों में लगभग 1.2 अरब युवा कार्यबल में शामिल होंगे, जबकि मौजूदा आर्थिक ढांचे — पूंजीवाद और समाजवाद — मिलकर केवल लगभग 40 करोड़ रोजगार अवसर ही उत्पन्न कर पाएंगे। उनका कहना है कि यदि इस बढ़ते अंतर को समय रहते नहीं संभाला गया, तो दुनिया को आर्थिक असमानता, सामाजिक तनाव, बड़े पैमाने पर पलायन और राजनीतिक अस्थिरता जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने इस संभावित स्थिति को “अत्यंत गंभीर और अस्थिर” बताते हुए कहा कि पारंपरिक आर्थिक मॉडलों में सीमित सुधार पर्याप्त नहीं होंगे। उनके अनुसार, वर्तमान समय में एक ऐसी नई आर्थिक व्यवस्था की आवश्यकता है जो मानव क्षमता को विकास के केंद्र में रखे।
दीपक शर्मा का मानना है कि मौजूदा पूंजीवादी मॉडल में श्रम को मुख्य रूप से लागत के रूप में देखा जाता है, जिसे लाभ बढ़ाने के लिए न्यूनतम रखना प्राथमिकता बन जाती है। दूसरी ओर, समाजवादी व्यवस्थाएं संसाधनों के वितरण पर तो ध्यान देती हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत कौशल, नवाचार और उद्यमशीलता की पूरी क्षमता को आर्थिक शक्ति में बदलने में सफल नहीं हो पातीं।
उन्होंने कहा,
“दुनिया में करोड़ों युवा ऐसे हैं जिनकी क्षमता आज भी औपचारिक आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पाई है। मौजूदा ढांचे उनकी वास्तविक उत्पादकता का सही मूल्यांकन नहीं कर पाते।”
इसी सोच के आधार पर उन्होंने “ह्यूमन रिसोर्स मोनेटाइजेशन इकोनॉमिक सिस्टम” (HRMES) का प्रस्ताव रखा है। इस मॉडल का उद्देश्य मानव कौशल, शिक्षा और संभावित उत्पादकता को केवल संसाधन नहीं बल्कि आर्थिक रूप से मूल्यवान परिसंपत्ति के रूप में स्थापित करना है।
इस व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्तियों की शिक्षा, अनुभव, कौशल और संभावित आर्थिक योगदान के आधार पर उनकी “ह्यूमन कैपिटल वैल्यू” निर्धारित की जाएगी। इसके साथ ही “ह्यूमन कैपिटल क्रेडिट नोट्स” और “ह्यूमन कैपिटल बॉन्ड्स” जैसे नए वित्तीय साधनों का सुझाव दिया गया है, जो भौतिक संपत्तियों के बजाय मानव उत्पादकता पर आधारित होंगे।
HRMES मॉडल में “यूनिवर्सल पोटेंशियल क्रेडिट्स” की अवधारणा भी शामिल की गई है। यह एक समय-सीमित वित्तीय सहायता प्रणाली होगी, जिसका उद्देश्य युवाओं और समूहों को उद्यम शुरू करने या स्वरोजगार विकसित करने के लिए शुरुआती आर्थिक सहयोग प्रदान करना है। यह सहायता पारंपरिक सब्सिडी या मुफ्त योजना की तरह नहीं होगी, बल्कि भविष्य की आय से वापस चुकाई जाने वाली संरचना पर आधारित होगी।
प्रस्ताव में “नेशनल HR अकाउंट” बनाने की बात भी कही गई है, जो मानव पूंजी के आर्थिक मूल्य का रिकॉर्ड तैयार करेगा और उसे व्यवस्थित रूप से प्रबंधित करेगा। इसके अलावा “मैनपावर ग्रिड” जैसी अवधारणा भी प्रस्तुत की गई है, जो कार्यबल की क्षमताओं को बाजार की मांग के अनुसार मैप, आवंटित और अनुकूलित करने का कार्य करेगी।
यह मॉडल श्रम और स्वामित्व के संबंध को भी नए तरीके से परिभाषित करने का प्रयास करता है। इसके तहत व्यक्ति या पेशेवर समूह अपनी “मोनिटाइज्ड” मानव पूंजी को उद्योगों, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जैसी उत्पादक परिसंपत्तियों में निवेश कर सकेंगे। इन परिसंपत्तियों से होने वाले लाभ का वितरण उनके योगदान के आधार पर किया जाएगा, जिससे कर्मचारी केवल श्रमिक नहीं बल्कि भागीदार भी बन सकेंगे।
शर्मा का मानना है कि इससे आर्थिक असमानता और पूंजी तक सीमित पहुंच जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है। यदि कौशल और क्षमता को भी एक प्रकार की संपार्श्विक संपत्ति (Collateral Asset) माना जाए, तो अधिक लोगों को आर्थिक गतिविधियों में शामिल किया जा सकेगा और पारंपरिक ऋण-आधारित वित्तीय मॉडल पर निर्भरता घटेगी।
उन्होंने कहा,
“जब मानव क्षमता को ही सबसे बड़ी आर्थिक संपत्ति के रूप में स्वीकार किया जाएगा, तब पूंजी की कमी से पैदा होने वाली कई बाधाएं स्वतः कम हो सकती हैं।”
यह प्रस्ताव वैश्विक वित्तीय अंतर को भी संबोधित करता है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार, निम्न और मध्यम आय वाले देशों को विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हर वर्ष 1.5 ट्रिलियन से 2.7 ट्रिलियन डॉलर तक की अतिरिक्त वित्तीय आवश्यकता होती है। शर्मा का कहना है कि यदि मानव पूंजी को एक नए एसेट क्लास के रूप में विकसित किया जाए, तो इससे कहीं अधिक आर्थिक मूल्य सृजित किया जा सकता है।
उन्होंने एक ऐसे आर्थिक ढांचे की कल्पना प्रस्तुत की है, जिसमें बड़े स्तर पर मानव संसाधन डेटाबेस विकसित किए जाएंगे, लोगों की संभावित उत्पादकता का मूल्यांकन किया जाएगा और उसी आधार पर वित्तीय साधनों का निर्माण होगा। उनके अनुसार, इससे अर्थव्यवस्थाएं पारंपरिक कर्ज-आधारित मॉडल से निकलकर मानव उत्पादकता आधारित एसेट-बैक्ड व्यवस्था की ओर बढ़ सकती हैं।
दीपक शर्मा ने चेतावनी दी कि यदि वैश्विक रोजगार संकट का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो लंबे समय में आर्थिक बहिष्करण सामाजिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव को बढ़ा सकता है।
उन्होंने विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से आग्रह किया कि वे विशेष रूप से विकासशील देशों में HRMES के पायलट प्रोजेक्ट्स शुरू करने पर विचार करें, जहां युवा आबादी और रोजगार की चुनौती सबसे अधिक है। उनका कहना है कि इससे परियोजना-आधारित ऋण मॉडल से आगे बढ़कर जनसंख्या-आधारित आर्थिक भागीदारी की नई व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
शर्मा ने कहा,
“दुनिया के युवाओं और कार्यबल को समस्या नहीं बल्कि एक विशाल आर्थिक संपत्ति के रूप में देखने की आवश्यकता है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों, वैश्विक संस्थानों और शोधकर्ताओं के साथ मिलकर इस मॉडल को और बेहतर बनाने तथा व्यवहारिक रूप देने के लिए संवाद और सहयोग के लिए तैयार हैं।
जब वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं तकनीकी बदलाव, ऑटोमेशन, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और बदलते श्रम बाजारों की चुनौतियों का सामना कर रही हैं, तब HRMES जैसे प्रस्ताव यह बहस फिर से तेज कर रहे हैं कि भविष्य में समावेशी, टिकाऊ और रोजगार-केंद्रित आर्थिक विकास कैसे सुनिश्चित किया जाए।
