
पुष्य नक्षत्र पर ‘प्रथम पूज्य’ का दिव्य अभिषेक
राजस्थान की राजधानी जयपुर के प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर में आज पुष्य नक्षत्र के पावन अवसर पर भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। सुबह से ही “गणपति बप्पा मोरया” के जयकारों के साथ मंदिर परिसर गुंजायमान है। इस खास मौके पर भगवान गणेश का 251 किलो दूध, दही, घी, शहद और बूरा से भव्य पंचामृत अभिषेक किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ संपन्न हुए इस अभिषेक के बाद गजानन को गंगाजल, केवड़ा और गुलाब जल से विशेष स्नान कराया गया। मान्यता है कि पुष्य नक्षत्र में किया गया यह अभिषेक भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला और सुख-समृद्धि प्रदायक होता है।
1001 मोदकों का महाभोग और सहस्त्रनाम पाठ
पंचामृत स्नान के पश्चात मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों की कड़ियाँ और भी भव्य हो गईं। सुबह 11 बजे गणपति सहस्त्रनाम के पाठ के साथ भगवान को उनके प्रिय 1001 मोदकों का महाभोग लगाया गया। मोदकों के इस अद्भुत नजारे को देखने और बप्पा का आशीर्वाद लेने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखी गईं। मंदिर प्रशासन द्वारा सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि भक्तों को सुगम दर्शन हो सकें। पूजा-अर्चना के बाद सभी श्रद्धालुओं को रक्षा सूत्र और हल्दी का विशेष प्रसाद वितरित किया गया, जिसे भक्त बड़ी श्रद्धा के साथ ग्रहण कर रहे हैं।
शाम को ‘फूल बंगले’ में विराजेंगे गजानन
धार्मिक कार्यक्रमों का यह सिलसिला केवल सुबह तक ही सीमित नहीं है। शाम 4 बजे भगवान गणेश को विशेष ‘फूल बंगले’ में विराजमान किया जाएगा, जहाँ उन्हें नई और आकर्षक पोशाक धारण कराई जाएगी। फूलों से सजे इस भव्य दरबार में बप्पा को विशेष भोग के रूप में खीर अर्पित की जाएगी, जिसका वितरण बाद में भक्तों के बीच होगा। शाम की आरती और फूल बंगले की झांकी को जयपुर के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक वैभव का प्रतीक माना जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए शहर के कोने-कोने से श्रद्धालु मोती डूंगरी पहुँच रहे हैं।
पुष्य नक्षत्र का आध्यात्मिक महत्व
ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पुष्य नक्षत्र को नक्षत्रों का राजा माना जाता है और इस दिन गणेश जी की आराधना करना अत्यंत फलदायी होता है। यह दिन किसी भी नए कार्य की शुरुआत, खरीद-फरोख्त और आध्यात्मिक सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यही कारण है कि जयपुर के व्यापारिक और सामाजिक जीवन में इस दिन का विशेष महत्व है। मंदिर में दिनभर चलने वाले इन आयोजनों से न केवल वातावरण में सकारात्मकता का संचार हो रहा है, बल्कि यह आयोजन जयपुर की “छोटी काशी” वाली छवि को और भी सुदृढ़ कर रहा है।
